विश्वभरिकै हिन्दी कविता प्रतियोगितामा नेपाली मूलका कार्की बिजयी

सधैँ कति सुन्ने भारतले हेपेको ? कति सुन्ने नेपालीले दुख पाएको ? कति भोग्ने, देख्ने नेपालीका पीडा ? कहिलेकाहीँ त आउन न नेपालीका सफलताका कथापनि होइन ? नेपाली मूलका अनिल कार्कीले त्यस्तै खुशि हुने अवसर दिएका छन् युनिकवी घोषित भएर । हिन्द युग्मको मासिक हिन्दी कविता प्रतियोगितामा कार्की युनिकवि घोषित भएका हुन् । उनले पाठ गरेको कविताले विश्वका सयौं हजारौंलाई उछिनेको थियो । यो कविता प्रतियोगिता विश्वभरिका हिन्दी भाषीबिच प्रतिस्पर्धा गराइन्छ ।

यहि जुलाई महिनामा सम्पन्न कविता प्रतियोगितामा ४६ कविता थिए । दुई चरणमा मूल्यांकन गरिएको छनौट प्रक्रियामा शुरुमा चार छनौटकर्ता र अन्तिममा दुई जना थिए । पहिलो चरणमा २४ कविता छानिएका थिए । उत्तराखण्ड राज्य हिन्दी कवीहरुको गढ मानिएपनि यस प्रतियोगितामा पहिलो पटक कार्की त्यस क्षेत्रबाट बिजयी भएका हुन् । उनले हिन्दी भाषामा लेखेको उक्त कविता हेर्नुस तल -

 यूनिकविता- मौन अपेक्षित है

जिला पुस्तकालय पिथौरागढ़ में दीवार पर टंगी तख्ती मौन अपेक्षित हैऔर सामने टेबल पर बैठी हमउम्र लड़की को देखकर-

किताबें,
कुछ-कुछ शोर,
गूँजता है-
एक नई किस्म की कम्पनी है।
एक पौधशाला।
व्यवस्था के नए चाकर यहीं पैदा होते हैं अब,
पूछो- सब आई.ए.एस., पी.सी.एस.,
मास्टरों, प्रोफेसरों की लम्बी कतार,
यहीं से निकलेगी कल,
ये वही जगह है- जहाँ दीवार पर टंगी है एक तख्ती,
जिस पर लिखा है- मौन अपेक्षित है।
कभी-कभार समाजशास्त्र, इतिहास, भूगोल पढ़ते हुए-
हल्के से निकल आती है,
लचर व्यवस्था की बात।
फिर दूसरे ही पल सावधान हो जाते हैं यह कहकर सब-
क्या लेना व्यवस्था से हमें, ये करियर की लड़ाई है।
इन टेबलों पर बैठ चाय पी लेने
या व्याख्यान दे देने से नहीं बचने वाली,
कविता, कहानी की अस्मिता।
वो बेच दी जायेगी
अलग-अलग फ्लेवरों में तुम्हारे ही सामने।
खुद को हिजड़ा कहने में भी तालियाँ नहीं बजेंगी।
कभी-कभी प्रतियोगिता परीक्षा की,
मोटी किताब के बीच हँसता है-
एक चेहरा कुछ देर के लिए,
तो लगता है, चालीस करोड़ भूखे नंगों का देश भी
हँसेगा, मुस्कुरायेगा।
हमने सोचा था कि धरती बहुत बड़ी है।
उसकी परिधि पर मानवता का महायज्ञ होगा।
और हम धीरे-धीरे अन्दर की ओर सिमटेंगे।
किसी केन्द्र बिन्दु पर।
कौन सा केन्द्र बिन्दु?
प्रेमिका की नाभि पर आधुनिकता देखने का निर्णय हमारा है।
उसके अधखुले जिस्म को चाट लेने का ख्वाब हमने ही सजाया है।
नहीं इस तरह नहीं!
बस घिन से थूक देने से काम नहीं चलेगा!
ये देश अकेले हमारा या अकेले उनका नहीं है।
ये चालीस करोड़ भूखे-नंगों का देश है, लूले और लंगड़ों का भी।
ये रिक्शा, टम्पो, इक्का, तांगा, बैलगाड़ी का देश है।
और कहाँ धरे के धरे रह गये तुम्हारे पोलियो के टीके!
चोरो! पुराने माल को हाईब्रिड बनाकर बेच रहे हो!
इस तरह कैमेस्ट्री, फिजिक्स, गणित का ट्यूशन पढ़ा लेना-
बुद्धिजीवी बन जाना नहीं होता।
किसी बार में बैठकर बियर की चुस्कियों के साथ,
शोषितों की बात करना अच्छा लगता है।
किसी अखबार का सम्पादक बन जाना भी अच्छा है।
और सुनो! क्यों पढ़ रही हो ये सब?
इसलिए न कि! अब लड़के पढ़ी-लिखी पत्नियाँ माँगते हैं।
ये मोटी किताबें दूल्हे पाने के लिए नहीं,
दूल्हे बने सत्ता के खिलाफ़ हथियार हैं।
आधुनिकता के मायने, फिगर मेन्टेन कर-
पतली कमर लचकाते हुए रैम्प पर उतरना नहीं होता है।
ये सब के सब वहशी चीर-फाड़ डालेंगे तुम्हें!
और तुम कानून की दुहाई देते रहना,
इस तरह नहीं-
कमीना होकर भी लड़ना अच्छा तो है-
दूध का धुला कोई नहीं होता।
पर मौन बिल्कुल अपेक्षित नहीं है!
ये तख्ती जो पुस्तकालय में टंगी है-
जिसपे लिखा है ‘मौन अपेक्षित है’
ये तख्तियाँ कल तुम्हारे घरों पे होंगी,
ये तख्तियाँ कल हमारे गले में डाल देंगी सरकारें।
मौन अपेक्षित नहीं है।
बस आज समझ लेना होगा-
मौन को अपेक्षित मान लेना ही-
मुखर हो जाने का सवाल है।
सवाल छोटा है पर-
बहुत बड़ा है मौन होना,
इस मौन के खिलाफ।

  • भीम के सी कमल

    बहुत अच्छा कबिता !

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  • Swagat Nepal

    Badhai chha Karki Sahab Badhai…. i salute you…Nepalplus lai pani dhanyabad.

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  • Badhai chha HAI Karki Sahab Badhai…. …….nepali ko seer oonchaa banaidinu bhayo….

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